तीव्र-गति
अति दूर तारा
वह हमारा
शून्य के विस्तार नीले में चला है।
और नीचे लोग
उस को देखते हैं, नापते हैं गति उदय औ’ अस्त का
इतिहास।
किन्तु इतनी दीर्घ दूरी,
शून्य के उस कुच-न-होने से बना जो नील का आकाश,
वह एक उत्तर
दूरबीनों की सतत आलोचनाओं को,
के सीमित या कि को।
वे नापने वाले लिखें उस के उदय औ’ अस्त की गाथा,
सदा ही ग्रहण का विवरण।
किन्तु वह तो चला जाता
व्योम का राही,
भले ही दृष्टि के बाहर रहे--उस का विपथ ही
बना जाता।
और जाने क्यों,
मुझे लगता कि ऐसा ही अकेला नील तारा,
तीव्र-गति,
जो शून्य में निस्संग,
जिस का पथ विराट्--
वह छिपा प्रत्येक उर में,
प्रति हृदय के कल्मषों के बाद
जैसे बादलों के बाद भी है शून्य नीलाकाश।
उस में भागता है एक तारा,
जो कि अपने ही प्रगति-पथ का सहारा,
जो कि अपना ही स्वयं बन चला चित्र
भीतिहीन विराट्-पुत्र।
इस लिए प्रत्येक मनु के पुत्र पर विश्वास करना चाहता हूँ।
-’मुक्तिबोध’
"मुक्तिबोध" के प्रसंग में कई शब्द मन में आते हैं। उन शब्दों में से (मेरे ख़्याल में) कोई एक इस कविता का वर्णन नहीं कर पायेगा। पहली और शायद सबसे बड़ी बात यह है कि हम मुक्तिबोध के विषय पर सोचते हुए "कोमल,", या "मधुरता," जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते हैं, यद्यपि यह कविता पढ़कर मैं पहले मधुरता का महसूस ही करता हूँ।
लेकिन कुछ ध्यान से सोचकर मुझे लगता है कि यह मुक्तिबोध की एक कविता ज़रूर है। वह ही नहीं, यह मुक्तिबोध की काव्यात्मक और विचारात्मक प्रकृया का एक बहुत अच्छा उदाहरण है। आधुनिक वैज्ञानिक अविष्कारों के प्रति जिज्ञासु भी है, और शंका भी। कविता में इस नई भाषा की दिखाई देती है, जो "शून्य" और "विस्तार" की नई परिभाषा तब दे रही थी। हालाँकि यहाँ झलक-सा मिलता हैं, हमें याद रखना चाहिए कि बाद में (यह कविता "तार सप्तक" में प्रकाशित थी) यह प्रवृत्ति साफ़ से दिखने लगी)। काव्यात्मक शैली के तौर पर जो "एन्जॉंब्मेन्ट" (इस का हिन्दी शब्द क्या है, दोस्तों?) यही है, जहाँ इतनी व्यापक तौर पर मुक्तिबोध की रचनाओं में मौजूद है।
लेकिन वह कोमलता जो है इस कविता में, मैने शायद ही मुक्तिबोध की दूसरी कविताओं में देखी है। इस कविता में हमको (या कम-से-कम मुझको) आशा की किरणें डुबो कर हमें गरम कर देते हैं (वह तो अँग्रेज़ी-सी लगी, पर लड्डु टेढ़ा भी भला है), और हालाँकि इस कविता का विषय विज्ञान और दूर अन्तर ही है, फिर भी कि वह तारा सिर्फ़ हमारे छोटा-सा ऊपर है।
