Wednesday, September 09, 2009

दूर तारा

तीव्र-गति
अति दूर तारा
वह हमारा
शून्य के विस्तार नीले में चला है।

और नीचे लोग
उस को देखते हैं, नापते हैं गति उदय औ’ अस्त का
इतिहास।

किन्तु इतनी दीर्घ दूरी,
शून्य के उस कुच-न-होने से बना जो नील का आकाश,
वह एक उत्तर
दूरबीनों की सतत आलोचनाओं को,
के सीमित या कि को।
वे नापने वाले लिखें उस के उदय औ’ अस्त की गाथा,
सदा ही ग्रहण का विवरण
किन्तु वह तो चला जाता
व्योम का राही,
भले ही दृष्टि के बाहर रहे--उस का विपथ ही
बना जाता।
और जाने क्यों,
मुझे लगता कि ऐसा ही अकेला नील तारा,
तीव्र-गति,
जो शून्य में निस्संग,
जिस का पथ विराट्‍--
वह छिपा प्रत्येक उर में,
प्रति हृदय के कल्मषों के बाद
जैसे बादलों के बाद भी है शून्य नीलाकाश।
उस में भागता है एक तारा,
जो कि अपने ही प्रगति-पथ का सहारा,
जो कि अपना ही स्वयं बन चला चित्र
भीतिहीन विराट्‍-पुत्र।
इस लिए प्रत्येक मनु के पुत्र पर विश्वास करना चाहता हूँ।

-’मुक्तिबोध’

"मुक्तिबोध" के प्रसंग में कई शब्द मन में आते हैं। उन शब्दों में से (मेरे ख़्याल में) कोई एक इस कविता का वर्णन नहीं कर पायेगा। पहली और शायद सबसे बड़ी बात यह है कि हम मुक्तिबोध के विषय पर सोचते हुए "कोमल,", या "मधुरता," जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते हैं, यद्यपि यह कविता पढ़कर मैं पहले मधुरता का महसूस ही करता हूँ।


लेकिन कुछ ध्यान से सोचकर मुझे लगता है कि यह मुक्तिबोध की एक कविता ज़रूर है। वह ही नहीं, यह मुक्तिबोध की काव्यात्मक और विचारात्मक प्रकृया का एक बहुत अच्छा उदाहरण है। आधुनिक वैज्ञानिक अविष्कारों के प्रति जिज्ञासु भी है, और शंका भी। कविता में इस नई भाषा की दिखाई देती है, जो "शून्य" और "विस्तार" की नई परिभाषा तब दे रही थी। हालाँकि यहाँ झलक-सा मिलता हैं, हमें याद रखना चाहिए कि बाद में (यह कविता "तार सप्तक" में प्रकाशित थी) यह प्रवृत्ति साफ़ से दिखने लगी) काव्यात्मक शैली के तौर पर जो "एन्जॉंब्मेन्ट" (इस का हिन्दी शब्द क्या है, दोस्तों?) यही है, जहाँ इतनी व्यापक तौर पर मुक्तिबोध की रचनाओं में मौजूद है।

लेकिन वह कोमलता जो है इस कविता में, मैने शायद ही मुक्तिबोध की दूसरी कविताओं में देखी है। इस कविता में हमको (या कम-से-कम मुझको) आशा की किरणें डुबो कर हमें गरम कर देते हैं (वह तो अँग्रेज़ी-सी लगी, पर लड्डु टेढ़ा भी भला है), और हालाँकि इस कविता का विषय विज्ञान और दूर अन्तर ही है, फिर भी कि वह तारा सिर्फ़ हमारे छोटा-सा ऊपर है।

Wednesday, September 02, 2009

दिल्ली एक: एकांत

घास और काँच के टुकड़े
तपस्यमय गरमी
वे लोग, जो कि
किसी चीज़ को ठीक कर रहे हैं
(या तो टाइर,
या ऐसी टूटी चीज़
जो धरती की गर्भ से
या गाड़ी की अंदर से
आती है)

एक घूरती हुई नज़र
जो पूछती है मुझसे
कुछ नहीं
जो शायद मेरी नज़र ही है

यह नज़र
मैंने देखी है कितनी बार
देखूँगा कितनी बार
और कब बोलूँगा मेरे दिल की बात
कब पूछूँगा--

यह क्या है
क्या है यह,
जिसे आप ठीक कर रहे हैं

Sunday, July 26, 2009

On the off chance--

That anyone still reads this, I hope to start working on this blog again very soon, still in a more or less bilingual frame of mine. I have no idea what that means, except that I think maybe I'm not really bilingual... maybe no one is really bilingual. In any case, "bilingual" means that it will talk about Hindi quite a bit, because that's what I do for a living, and that it will presumably drop some of those funny squiggles with the bar over the top.

All that being said, it goes without saying I don't actually have any content to present. I would like to make this more of my professional face, so to speak, in order to develop an online space for the things I'm interested in--Hindi, the study of South Asian literature and literature in general, good bookstores in Delhi, that kind of thing. We'll see.

In the absolute meantime, I should try to publicize the existence of this, which I think is easily the coolest thing to happen to Hindi online in a while. The शब्दसागर is the most extensive dictionary of Hindi that exists, and the fact that it's now online means that at any time, you can access in seconds what previously would require access to an eleven-volume dictionary and several minutes of page-flipping. Unfortunately, it seems to have a problem after प, but I'm sure that will be resolved (hopefully in sooner time than it took to get the thing up in the first place).

Thursday, October 19, 2006

दोस्तों...

यह इस ब्लोग की अखिरी हिन्दी चिट्ठा है। लेकिन घबराओ मत: आज से मैं यहाँ पर लिखूँगा। मैने हमेशा महसूश किया था कि इस ब्लोग का शीर्षक थोरा-सा अजीब था हिन्दी-ब्लॉग के लिए, तो अभी क्योंकि मैंने इतने समय से उसपर नहीं लिखा है, इसलिए मुझे लगता है कि अब एक नया शुरुआत का मौका है। तो मुझे बहुत उम्मीद है कि आप लोग मेरी नई ब्लॉग पढ़ें जो इस ब्लॉग पढ़ते थे।

फीर भी मुझे इस शीर्षक से बहुत पसन्द है... शायद मैं एक अंग्रेज़ी ब्लॉग शुरू करूँ... हम देखेंगे!

Friday, October 06, 2006

दिल्ली जा रहा हूँ...

दिल्ली! सवैद जीता रहता तो पुरे तरह से नहीं जानता वह शहर। लेकिन इस बार ऊ०पी० और जयपुर में रहने के बाद समझ सकता हूँ कि वह बढ़िया शहर है, और अभी मैं उससे राज़ी हूँ जिसने कहा कि दिल्ली कुछ वक्त में और सिर्फ़ कुछ लोगों को अपनी रहस्य बतलाएंगी। तो चला जा रहा हूँ। अभी ज़िन्दगी थोरी-सी चकरायी ही, लेकिन उम्मीद रखूँगा, दोस्तों!

Thursday, October 05, 2006

दोस्तों!

तो क्या कोई लोग इस चिट्टी अभी तक पढ़ता है?

माफ़ कीजिएगा: क्या हुआ? मेरा कोई सफ़ाई नहीं, बस यह है कि इन पिछले तिनों (चारों) महिनों में मैं बहुत मस्रूफ़ था।

क्या हुआ?

छोटा-सा लिस्ट बना सकता: लखनऊ, नस्तलीक़, मायावटी का घर, पुरानी हवेलियाँ, फूलों की घाटी, अमीबज़, किन्नौर और स्पीटी, जयपुर, और अखिरी... खैर, मुझे हमेशा कुछ उम्मीद है--कहानी निरंतर है...

जितने घनटे मैने आने से पहले बस में गुज़ारे, मैं इन पिछले महिनों में और गुज़ारे है। और अब नई यॉर्क एक गुज़्रिश्ती याद है जो ज़्यादातर खाने के रूप में उठाता है (मैं अभी कहता हूँ कि इंडिया में अच्छा पित्ज़ा नहीं मिलेगा: कोई सुझाव?)।

ज़िंदगी कभी मुश्किल है, कभी आसान, लेकिन हमेशा दिल्चस्प। अगर आप लोग माफ़ कर दे सकते हैं मेरा ग़ैरहाज़ीर, तो मैं सभी के बारे में बात करूँगा: और इतनी बातें हैं बताने लिए? उसकेपास कुछ कहानियाँ हैं जो दोनों लखनऊ और जयपुर में रहा एक साल में रहा!

लेकिन अभी एक सवाल: क्या किसिने 'कितने पाकिस्तान' कभी पढ़ी? वह भी बात है...

Monday, March 27, 2006

ब्रुक्लिन में एक पाठक है

आज अपने साइटमीटर को देखते-देखते मुझे ध्यान आया कि ब्रुक्लिन में एक पाठक है मेरे ब्लोग का। मुझे बहुत दिलचस्प लगती है इस बात और मुझे अश्चर्य भी है। आप कौन है और कैसे आये है आप? मत घबराए, मुझेसे डरना का कारण नहीं है :)
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