Tuesday, December 06, 2005

नासमझ का फ़ायदा (दुसरा पाठ)

इस जैसे काम के लिए मेरी हिंदी अच्छी नहीं थी। मुझे कुछ मदद चाहिए। मैं एस० ऐ० टी० की क्लास सीखाता हूँ जिसमें अक्सर कुछ हिंदी या ऊर्दू बोलनेवाले विध्यारथी हैं। कभी-कभी मैं उनसे हिंदी में बात किया करता हूँ और कोई हिंदी की बात के बारे में पुछा करता हूँ। वैसे विद्यार्थों को मैने यह वाक्य दिखाई। उसने पढ़ी... और मुझे यह बयाया कि इस वाक्य का मतलब ही है कि नौजवान लड़के ने आत्महत्या की थी।

सहसा यह कहानी थोड़ी-सी आजीब हो गयी थी। अगले दिन मैने दुबारा पड़ी। और भी मैने 'आत्मा' का मतलब शब्दकोश में तलाश किया। इस बार मुझे लगा कि 'आत्मा' का एक और मतलब है जो अंग्रेज़ी में 'ghost' जैसा है।

इस अनुभूती ने कहानी में बड़ी फ़र्क पैदा किया। जैसे ही मैने इस शब्द का अर्थ सीखा वैसे ही सारी कहानी का मतलब बदल हो गया। मैने तीसरा बार कहानी पढ़ी। और इस बार पड़ते-पड़ते मुझे समझ आयी कि सब लोगों को देहांत हुए!

'सिक्स्थ सेंस' के अंत (जिसमें फ़िल्म के अंत में मुख्यपात्र को समझ अयी कि ख़ुद मौत है) जैसी एहसास मुझे आयी। अब बड़े द्यान से पढ़ रहा था और एक के बाद एक खोजें आ रहीं थीं। जब "एक साधू बैठा... बड़बड़ा रहा था 'साधू-संत के प्राण लेना खेल नहीं है'" तब अपने ही प्राणे के बारे में बड़बड़ा रहा था! और दुसरे-दुसरे हिस्सों के मतलब साफ़ हो गए। एक बार जब यात्राएं ट्रेन से उतरते हुए पुछते है "स्वर्ग आ ग्या क्या?" तब असली ही स्वर्ग के बारे में पुछ रहे हैं। बहुत माज़ा ही है।

और देखिए न-- अगर मुझे पुरी हिंदी आयी होती तो यह आश्चर्य नहीं होता। और मेरेलिए यहीं आश्चर्य कहानी के सबसे अच्छे हिस्सा था। तो यहीं नासमझ का फ़ायदा है कि हम अपनी नासमझ से सीखते जा रहे हैं। तो इस वजह से अज्ञान कभी-कभी बहुत अच्छा चीज़ होगा। लेकिन हमेशा नहीं।

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